USCIRF सुनवाई में हिंदुत्व विचारधारा और राष्ट्रवादी संगठनों पर टिप्पणी, भारतीय नेताओं पर प्रतिबंध की मांग से बढ़ी राजनीतिक बहस
अमेरिकी मंच पर हिंदुत्व समर्थक नेताओं को घेरने की कोशिश, धामी-योगी-हिमंता पर उठे सवाल pic.twitter.com/PEzSeOzNKD
— pahadinari (@pahadinari07) May 27, 2026
भारत में सनातन संस्कृति, हिंदुत्व और राष्ट्रवादी विचारधारा को लेकर चल रही बहस अब अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचती दिखाई दे रही है। अमेरिका की तथाकथित धार्मिक स्वतंत्रता आयोग United States Commission on International Religious Freedom (USCIRF) की हालिया सुनवाई में भारत के तीन प्रमुख मुख्यमंत्रियों — Pushkar Singh Dhami, Yogi Adityanath और Himanta Biswa Sarma — को लेकर विवादित टिप्पणियां सामने आई हैं।
सुनवाई के दौरान वामपंथी-उदारवादी विचारधारा से जुड़े एक्टिविस्ट रक़ीब अहमद नाइक ने हिंदुत्व विचारधारा, राष्ट्रवादी संगठनों और भारत की लोकतांत्रिक सरकारों की आलोचना करते हुए इन नेताओं पर प्रतिबंध लगाने की मांग की। इसके साथ ही Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS), Vishva Hindu Parishad और बजरंग दल जैसे संगठनों का भी उल्लेख किया गया।
राजनीतिक और वैचारिक बहस तेज
इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस तेज हो गई है। समर्थकों का कहना है कि ये नेता भारत की संस्कृति, धार्मिक पहचान और राष्ट्रीय हितों से जुड़े मुद्दों को खुलकर उठाते रहे हैं।
उत्तराखंड में मुख्यमंत्री धामी द्वारा समान नागरिक संहिता, अवैध कब्जों और धर्मांतरण जैसे मुद्दों पर लिए गए फैसले चर्चा में रहे हैं। वहीं उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ ने माफिया और कट्टरपंथ के खिलाफ कार्रवाई को प्राथमिकता दी है, जबकि असम में हिमंता बिस्वा सरमा घुसपैठ और जनसंख्या असंतुलन जैसे मुद्दों पर लगातार मुखर रहे हैं।
विदेशी मंचों पर भारत की छवि को लेकर सवाल
इस मामले ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या भारत की आंतरिक राजनीतिक और सांस्कृतिक बहसों को विदेशी मंचों पर ले जाना उचित है। आलोचकों का कहना है कि इससे भारत की लोकतांत्रिक छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश होती है, जबकि दूसरी ओर मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े संगठनों का दावा है कि वे वैश्विक स्तर पर इन मुद्दों को उठाने का काम करते हैं।
विश्लेषकों के अनुसार, यह विवाद केवल तीन मुख्यमंत्रियों तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत में संस्कृति, धर्म और पहचान की राजनीति को लेकर चल रही व्यापक वैचारिक बहस का हिस्सा बन चुका है।



