प्रयागराज महाकुम्भ की शान माने जाने वाले 13 अखाड़ों में से एक श्री पंच दशनाम जूना अखाड़े में नागा संन्यासियों की संख्या बढ़ाने के लिए दीक्षा की प्रक्रिया शुरू हो गई है। शनिवार से गंगा के तट पर इस अखाड़े में 1500 से अधिक अवधूतों को नागा संन्यासी की दीक्षा दी जाएगी। जूना अखाड़ा, जो महाकुम्भ में सबसे अधिक नागा संन्यासियों वाला अखाड़ा है, में नागा संन्यासियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है और इस बार दीक्षा की प्रक्रिया को लेकर उम्मीदें काफी अधिक हैं।
नागा संन्यासी भगवान शिव के दिगम्बर भक्त होते हैं और महाकुम्भ में उनकी उपस्थिति आकर्षण का केंद्र बनती है। यही कारण है कि जूना अखाड़े में सबसे अधिक जन आस्था का संचार होता है। अखाड़ों के अवधूतों का यह परंपरागत आयोजन 12 साल के अंतराल में होता है, और इस बार भी लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ इसमें भाग लेगी।
जूना अखाड़े के अंतरराष्ट्रीय मंत्री महंत चैतन्य पुरी ने बताया कि शनिवार से नागा दीक्षा की प्रक्रिया शुरू हो गई है। पहले चरण में 1500 से अधिक अवधूतों को दीक्षा दी जा रही है, और अखाड़े में अब तक 5.3 लाख से अधिक नागा संन्यासी हैं। यह संन्यास केवल महाकुम्भ में ही लिया जाता है, और इसके लिए साधकों को एक कठोर प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
नागा संन्यासी बनने के लिए सबसे पहले साधक को ब्रह्मचारी के रूप में रहना होता है। उसे तीन साल तक गुरुओं की सेवा करने के बाद धर्म-कर्म और अखाड़े के नियमों को समझना पड़ता है। यदि साधक इस प्रक्रिया में सफल होता है तो वह नागा दीक्षा के लिए तैयार होता है। महाकुम्भ में गंगा किनारे उनका मुंडन कराकर 108 बार नदी में डुबकी लगाई जाती है और अंतिम संस्कार प्रक्रिया के तहत दण्डी संस्कार आदि होते हैं।
अखाड़े की धर्म ध्वजा के नीचे आचार्य महामंडलेश्वर द्वारा दीक्षा दी जाती है। दीक्षा लेने वाले नागा संन्यासियों को उनकी दीक्षा स्थान के आधार पर विभिन्न नामों से जाना जाता है। प्रयागराज में दीक्षा लेने वाले नागा संन्यासियों को ‘राज राजेश्वरी नागा’ कहा जाता है, वहीं उज्जैन में दीक्षा लेने वाले ‘खूनी नागा’, हरिद्वार में ‘बर्फानी नागा’ और नासिक में दीक्षा लेने वाले ‘खिचड़िया नागा’ के नाम से प्रसिद्ध होते हैं।



