वैज्ञानिक जीवाणुओं से हिमालयी कचरा स्थलों की सफाई का नया प्रयोग
परिचय
हिमालय की ऊँचाइयों में बढ़ते कचरा प्रदूषण से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने जीवाणुओं की सहायता लेने का निर्णय लिया है। सोबन सिंह जीना परिसर के शोधकर्ताओं ने मुख्य शोध अन्वेषक डा. मुकेश सामंत के नेतृत्व में एक अध्ययन शुरू किया है।
शोध के मुख्य निष्कर्ष
अल्मोड़ा के फलसिमा, हल्द्वानी, लालकुआं पेपर मिल, सितारगंज, रुद्रपुर और हरिद्वार के औद्योगिक क्षेत्रों से लिए गए मिट्टी, पानी और कचरे के नमूनों में 820 अलग‑अलग जीवाणु प्रजातियाँ पाई गईं। इन जीवाणुओं में से कई भारी धातुओं, औद्योगिक रंगों और कीटनाशकों को तोड़ने की क्षमता रखती हैं।
विशेष जीवाणु और उनकी क्षमताएँ
स्टेनोट्रोफोमोनास माल्टोफिलिया नामक जीवाणु विशेष रूप से प्रभावी पाया गया। यह जटिल रसायनों को छोटे, कम हानिकारक पदार्थों में बदलने वाले प्राकृतिक एंजाइम बनाता है। प्रयोग में कांगो रेड, ब्रिलियंट ग्रीन और मेथिलीन ब्लू जैसे रंगों को तोड़ने की क्षमता की जाँच की गई।
इसके अलावा, तांबा, निकेल, जस्ता, सीसा, मैंगनीज और पारे जैसी जहरीली धातुओं के बीच भी जीवाणुओं के व्यवहार का अध्ययन किया गया। सितारगंज के औद्योगिक पानी से मिले कुछ जीवाणु 650 पीपीएम से अधिक पारे की मात्रा में भी सक्रिय पाए गए।
भविष्य की योजनाएँ
शोध दल ने इन जीवाणुओं को छोटे जैविक कैप्सूल में सुरक्षित रखने की तकनीक पर काम शुरू किया है। कैप्सूल के माध्यम से नियंत्रित मात्रा में जीवाणुओं को प्रदूषित मिट्टी और पानी में छोड़ा जा सकेगा, जिससे उनकी प्रभावशीलता और उपयोग अवधि बढ़ेगी। भविष्य में इस तकनीक का उपयोग कचरा डंपिंग स्थलों, प्रदूषित जलधाराओं और औद्योगिक क्षेत्रों में किया जा सकता है।
परियोजना का महत्व
राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन के तहत 2024 में डा. मुकेश सामंत को यह परियोजना मिली थी। इसका उद्देश्य विशिष्ट सूक्ष्म जीव समूहों का उपयोग करके खतरनाक औद्योगिक और नगरपालिका अपशिष्ट को निष्क्रिय करने वाली जैव उपचार प्रौद्योगिकियाँ विकसित करना है। 820 जीवाणुओं में से सबसे प्रभावी प्रजातियों की पहचान से अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों के उपचार की संभावनाएँ खुल रही हैं।



