उत्तराखंड के लोक पर्व ‘इगास बगवाल’ की गाथा: वीर माधो सिंह भंडारी की तिब्बत विजय के बाद मनाया गया झूमलो उत्सव

उत्तराखंड: वीर माधो सिंह भंडारी की तिब्बत विजय और इगास बगवाल का ऐतिहासिक महत्व
उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में मनाया जाने वाला ‘इगास बगवाल’ उत्सव न केवल सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है, बल्कि यह एक वीरता की गाथा भी है, जो सदियों से गढ़वालवासियों के दिलों में जीवित है। यह उत्सव विशेष रूप से वीर माधो सिंह भंडारी की वीरता के सम्मान में मनाया जाता है, जिन्होंने तिब्बत (भोटन्त देश) के राजा शौका के आक्रमण को विफल करते हुए गढ़वाल राज्य की सीमा की रक्षा की थी।

वीरता की गाथा
सोहलवीं सदी (1603-1627) में गढ़वाल राज्य के शासक महाराजा महीपत शाह जी के शासनकाल में गढ़वाल राज्य को बाहरी आक्रमणों का सामना करना पड़ा था। उस समय के प्रमुख सेनापतियों में से एक वीर माधो सिंह भंडारी थे, जिन्होंने तिब्बत की सीमा पर शौका के आक्रमण को कड़ा प्रतिरोध दिया। महीनों तक चले संघर्ष के बाद, माधो सिंह भंडारी ने तिब्बती सेना को हराकर गढ़वाल राज्य की सीमा को सुरक्षित किया।

तिब्बत पर विजय प्राप्त करने के बाद, माधो सिंह भंडारी ने गढ़वाल लौटने का रास्ता तय किया। मगर, उनकी सकुशल वापसी की कोई खबर नहीं मिली, जिसके कारण महाराजा महीपत शाह ने राज्यभर में दीपावली के आयोजन पर रोक लगा दी।

इगास बगवाल और झूमलो उत्सव का प्रारंभ
कार्तिक माह की एकादशी (इगास) के दिन, जब वीर माधो सिंह भंडारी की घर वापसी का समाचार आया, तो महाराजा महीपत शाह ने राज्यभर में खुशी का माहौल बनाने का आदेश दिया। सैनिकों की वापसी के सम्मान में और वीर माधो सिंह भंडारी की साहसिकता की सराहना करते हुए, पूरे गढ़वाल में दीप जलाए गए और झूमते हुए नृत्य किया गया।

यह परंपरा आज भी जीवित है, और इगास बगवाल के रूप में हर साल मनाई जाती है। खास बात यह है कि इस दिन के साथ जुड़ा नृत्य ‘झूमलो’ (झूम+लौ) का जन्म हुआ। यह नृत्य और गीत गढ़वाल की लोक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन गए हैं।

समाज में इगास का महत्व
इगास बगवाल का पर्व न केवल एक सांस्कृतिक उत्सव है, बल्कि यह गढ़वालवासियों के बीच वीरता, शौर्य और एकता का प्रतीक बन चुका है। हर साल यह पर्व दीप जलाने, लोक गीत गाने और झूमने का आनंद लेकर मनाया जाता है। साथ ही, यह पर्व वीर माधो सिंह भंडारी के योगदान और गढ़वाल की वीरता को याद करने का अवसर भी है।

समाप्त होने के बाद, इस उत्सव में भाग लेने वाले लोग अपने परंपरागत परिधानों में सजकर नृत्य करते हैं, जो इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को उजागर करता है।

दिल्ली में इगास की धूम, पीएम मोदी भी पहुंचे शामिल होने
दिल्ली। उत्तराखंड के इगास पर्व की धूम दिल्ली तक है। राज्यसभा सदस्य और भाजपा के मुख्य राष्ट्रीय प्रवक्ता अनिल बलूनी के दिल्ली आवास पर इगास (बूढ़ी दिवाली) पर्व धूमधाम से मनाया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उत्सव में शामिल होने पहुंचे। इस दौरान पीएम मोदी ने उत्तराखंड के दो कलाकारों को अपना आशीर्वाद दिया। दिल्ली में इगास पर आयोजित कार्यक्रम में उत्तराखंड के रुहान भरद्वाज और करिश्मा शाह ने अपनी बेहतरीन प्रस्तुति से पीएम मोदी सहित दर्शकों को दिल जीता।

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प्रधानमंत्री मोदी ने इस बात की सराहना की कि अनिल बलूनी ने उत्तराखंड के इस प्राचीन पर्व को संरक्षित करने और देशभर में मनाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किए हैं। बलूनी ने बताया कि प्रधानमंत्री की प्रेरणा से उन्होंने इस पर्व को पुनर्जीवित करने की पहल की, जिसे लगभग भुला दिया गया था। पांच सालों के कठिन प्रयासों के बाद अब यह पर्व न केवल उत्तराखंड में, बल्कि देश और विदेशों में भी मनाया जा रहा है।

बलूनी ने इस अवसर पर उत्तराखंड राज्य सरकार द्वारा इगास के दिन सार्वजनिक अवकाश घोषित करने के फैसले का भी स्वागत किया। उन्होंने इस कदम को राज्य की सांस्कृतिक धरोहर और परंपराओं को मान्यता देने वाला महत्वपूर्ण कदम बताया।

स्रोत: यह लेख वरिष्ठ रंगकर्मी एवं लोक-साहित्यकार आचार्य कृष्णानन्द नौटियाल द्वारा लिखा गया है।

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