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उत्तराखंड के बागेश्वर में शंभू नदी पर बनी प्राकृतिक झील बनी खतरा, 37 लाख घनमीटर पानी जमा होने से दहशत

2013 की आपदा के बाद से लगातार बढ़ रहा है झील का आकार, वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी

बागेश्वर: उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में शंभू नदी पर भूस्खलन के कारण बनी एक प्राकृतिक झील का आकार लगातार बढ़ता जा रहा है। कपकोट तहसील के कुवारी इलाके में स्थित यह प्राकृतिक झील अब एक किलोमीटर से भी अधिक लंबी हो चुकी है। इस झील के बढ़ते जलस्तर के कारण नदी किनारे स्थित पारंपरिक श्मशान घाट पूरी तरह जलमग्न हो चुका है, जिससे स्थानीय ग्रामीणों के सामने अंतिम संस्कार का संकट खड़ा हो गया है।

हैदराबाद स्थित नेशनल रिमोट सेंशिंग सेंटर (NRSC) के वैज्ञानिकों के अनुसार, इस झील में वर्तमान में लगभग 37 लाख घनमीटर पानी जमा है। मलबे के इस कच्चे बांध के टूटने से निचले इलाकों में ‘लैंडस्लाइड लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (LLOF) का गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।

2013 की केदारनाथ आपदा से शुरू हुआ सिलसिला

शंभू ग्लेशियर से निकलने वाली शंभू नदी में पानी रुकने का यह सिलसिला जून 2013 की ऐतिहासिक केदारनाथ आपदा के समय शुरू हुआ था। उस दौरान कुवारी पहाड़ी का एक विशाल हिस्सा टूटकर नदी की घाटी में गिर गया था, जिससे नदी का प्राकृतिक बहाव बाधित हो गया। इसके बाद से यहां लगातार पानी जमा हो रहा है।

साल 2023 में भी जलस्तर बढ़ने पर सिंचाई विभाग ने मैनुअल तरीके से पानी की निकासी कराई थी। हालांकि, पहाड़ से लगातार गिरने वाले मलबे के कारण नदी का मुहाना बार-बार बंद हो जाता है।

सैटेलाइट डेटा में बड़ा खुलासा: 400 मीटर से 1130 मीटर तक बढ़ी झील

NRSC के वैज्ञानिकों ने वर्ष 2013 से 2025 तक के सैटेलाइट डेटा का विश्लेषण किया है। इस अध्ययन के अनुसार, झील का फैलाव साल-दर-साल इस प्रकार बढ़ा है:

  • नवंबर 2013: लंबाई 400 मीटर और चौड़ाई 20 मीटर।
  • साल 2021: लंबाई बढ़कर 680 मीटर हुई।
  • अक्टूबर 2023: लंबाई 1050 मीटर और चौड़ाई 85 मीटर पार कर गई।
  • अक्टूबर 2024: झील की लंबाई रिकॉर्ड 1130 मीटर (1.13 किमी) और चौड़ाई 100 मीटर तक दर्ज की गई।

वैज्ञानिकों ने दी ‘रेट्रोग्रेसिव लैंडस्लाइड’ की चेतावनी

वैज्ञानिकों के अनुसार, कुवारी में हो रहा भूस्खलन ‘रेट्रोग्रेसिव लैंडस्लाइड’ की श्रेणी में आता है। इसका अर्थ है कि पहाड़ी ढलान नीचे की तरफ गिरने के साथ-साथ ऊपर और पीछे की तरफ भी खिसक रहा है। पहाड़ में नई दरारें आ रही हैं और चट्टानें कमजोर हो रही हैं, जिससे कभी भी मलबे का एक और बड़ा हिस्सा नदी में गिर सकता है। मानसून के दौरान तेज बारिश होने पर यह विस्थापन और अधिक तीव्र हो जाता है।

प्रशासन ने लिया स्थिति का जायजा

झील का जलस्तर बढ़ने के बाद सिंचाई विभाग, राजस्व विभाग और भूवैज्ञानिकों की एक संयुक्त तकनीकी टीम ने मौके का मुआयना किया। अपर जिलाधिकारी (एडीएम) एनएस नबियाल ने बताया कि वर्तमान में झील से पानी का निकास प्राकृतिक रूप से धीरे-धीरे हो रहा है, जिससे तुरंत कोई आपात स्थिति नहीं है। हालांकि, विस्तृत रिपोर्ट शासन को भेज दी गई है और विशेषज्ञ संस्थाओं से इसका हाइड्रोलॉजिकल सर्वेक्षण कराने की सिफारिश की गई है।

कंप्यूटर सिमुलेशन मॉडलिंग के अनुसार, यदि यह प्राकृतिक बांध अचानक टूटता है, तो पानी का वेग 15 मीटर प्रति सेकंड तक हो सकता है और निचले इलाकों में नदी का जलस्तर सामान्य से 10 मीटर तक ऊपर उठ सकता है।

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