जानिए नैनीताल के हनुमानगढ़ी से लेकर कैंची धाम के निर्माण और बाबा के भक्त पूर्णानंद तिवारी से जुड़ी अनसुनी कहानी
नैनीताल का नीम करौली बाबा धाम आज दुनिया भर के श्रद्धालुओं की आस्था का बड़ा केंद्र है। हाल ही में बाबा नीम करौली महाराज के जीवन पर आधारित फिल्म ‘हनुमान अंश’ काफी चर्चा में है। इस फिल्म में बाबा के आध्यात्मिक सफर और उनकी लीलाओं को बखूबी दर्शाया गया है। लेकिन बाबा की कहानी इस फिल्म के अंत से भी आगे जाती है, जिसका गहरा नाता नैनीताल और कैंची धाम से है।
घने जंगल में भक्त से पहली मुलाकात
नैनीताल के हनुमानगढ़ी मंदिर के व्यवस्थापक एमपी सिंह ने बाबा के अनन्य भक्त स्वर्गीय पूर्णानंद तिवारी से जुड़ी एक दिलचस्प कथा साझा की है। इसके अनुसार, साल 1942 में पूर्णानंद तिवारी जब नैनीताल से कैंची की ओर लौट रहे थे, तब भूमियाधार के जोखिया क्षेत्र के घने जंगल में उनकी मुलाकात बाबा नीम करौली से हुई।
बाबा ने अचानक उन्हें नाम लेकर पुकारा, जिसे सुनकर वह हैरान रह गए। पूर्णानंद तिवारी ने जब बाबा से अपने घर आने का आग्रह किया, तो बाबा ने कहा कि वह 20 साल बाद उनके घर आएंगे। इसके बाद बाबा रानीखेत और अल्मोड़ा के क्षेत्रों में भ्रमण पर चले गए।
कब्रिस्तान की जगह पर बना हनुमानगढ़ी मंदिर
वर्ष 1950 के आसपास बाबा नीम करौली नैनीताल पहुंचे और मनोरा पहाड़ी के उस सुनसान इलाके में गए, जहां बच्चों का कब्रिस्तान हुआ करता था और लोग वहां जाने से डरते थे। बाबा ने वहां एक छोटी सी कुटिया बनाई और हनुमान जी की मूर्ति स्थापित की। धीरे-धीरे यही स्थान आज के प्रसिद्ध हनुमानगढ़ी मंदिर के रूप में बदला। बाबा ने यहां शिव मंदिर और राम मंदिर का भी निर्माण कराया।
शिप्रा नदी के किनारे ऐसे हुई कैंची धाम की शुरुआत
करीब एक दशक तक नैनीताल में रहने के बाद, बाबा 1960 में भूमियाधार चले गए और फिर 1962 में उन्होंने कैंची क्षेत्र का रुख किया। बाबा ने पूर्णानंद तिवारी के साथ मिलकर शिप्रा नदी के किनारे सोमवारी महाराज की पुरानी धूनी को खोजने की इच्छा जताई। जंगल का रास्ता साफ करने के बाद वह स्थान मिला, जिससे आगे चलकर आज के विश्व प्रसिद्ध कैंची धाम की नींव पड़ी।
20 साल पुराना वादा और एंबेसडर कार का किस्सा
पूर्णानंद तिवारी के बेटे उमेश तिवारी ने बताया कि 1942 में बाबा ने उनके पिता से वादा किया था कि वह 20 साल बाद उनके घर आएंगे। साथ ही, बाबा ने उनके अदालती मुकदमों को लेकर भी भविष्यवाणी की थी कि एक मुकदमा वह अगले दिन जीतेंगे और दूसरा 20 साल बाद। बाबा की यह बात पूरी तरह सच साबित हुई।
साल 1962 में चक्की से जुड़े मुकदमे का फैसला पूर्णानंद तिवारी के पक्ष में आया। इसके तुरंत बाद, मई 1962 में अचानक उनके घर के बाहर एक एंबेसडर कार आकर रुकी, जिसमें से स्वयं बाबा नीम करौली उतरे। बाबा ने उन्हें दो दशक पुरानी मुलाकात की याद दिलाई। इस चमत्कारिक घटना के बाद पूर्णानंद तिवारी बाबा के परम भक्त बन गए और कैंची धाम के निर्माण में अपना अमूल्य सहयोग दिया।





