उत्तराखंड राज्य कर्मचारियों की आचरण नियमावली में संशोधन, दो माह से अधिक के बेसिक पे पर खरीद-बिक्री की सूचना एक महीने में देना अनिवार्य
देहरादून। उत्तराखंड सरकार ने राज्य के अधिकारियों और कर्मचारियों के चल संपत्ति खरीदने और बेचने से जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव किया है। शासन ने ‘उत्तराखंड राज्य कर्मचारियों की आचरण नियमावली, 2002’ में संशोधन करते हुए अब चल संपत्ति की खरीद-बिक्री की रिपोर्टिंग सीमा को बढ़ा दिया है। राज्यपाल की मंजूरी मिलने के बाद कार्मिक एवं सतर्कता विभाग ने इस आशय की आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है।
नियम 22(2) में बदलाव, मोबाइल-लैपटॉप जैसे सामान पर अब राहत
कार्मिक विभाग के अपर सचिव गिरधारी सिंह रावत द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, नियमावली के नियम 22(2) में संशोधन किया गया है। नए प्रावधान के तहत अब कर्मचारियों को केवल तभी अपने नियुक्ति या सक्षम प्राधिकारी को सूचना देनी होगी, जब चल संपत्ति की खरीद या बिक्री का मूल्य उनके दो महीने के मूल वेतन (बेसिक पे) से अधिक होगा। यह जानकारी सौदा होने के एक महीने के भीतर देनी होगी।
इससे पहले के नियमों के मुताबिक, कर्मचारियों को एक महीने के वेतन या 5,000 रुपये में से जो भी कम हो, उससे अधिक कीमत के चल लेन-देन का ब्योरा देना अनिवार्य था। पुरानी व्यवस्था के कारण स्मार्ट फोन, टीवी, लैपटॉप और घरेलू इस्तेमाल की छोटी चीजों की खरीद पर भी कागजी प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती थी। कर्मचारी संगठन लंबे समय से बढ़ती महंगाई और मौजूदा वेतनमान का हवाला देकर इसे बदलने की मांग कर रहे थे।
सरकारी ठेकेदारों व संविदाकारों से सौदे के लिए लेनी होगी पूर्व अनुमति
अधिसूचना में सरकार के साथ वित्तीय या प्रशासनिक संबंध रखने वाले व्यक्तियों, कंपनियों, फर्मों और ठेकेदारों की परिभाषा भी साफ की गई है। इसके तहत लाइसेंस, टेंडर, सप्लाई या अन्य प्रशासनिक मामलों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े व्यक्ति शामिल हैं। यदि कोई कर्मचारी ऐसे किसी व्यक्ति या संस्था के साथ अपनी चल या अचल संपत्ति का लेन-देन करता है, तो उसे पहले से अनुमति लेना अनिवार्य होगा ताकि हितों के टकराव को रोका जा सके।
वार्षिक संपत्ति ब्योरे और बीमा एजेंसी से जुड़े अन्य नियम
आचरण नियमावली के अन्य प्रावधान पूर्ववत लागू रहेंगे। समूह ‘क’, ‘ख’ और ‘ग’ श्रेणी के कर्मचारियों को हर वर्ष अपनी कुल चल-अचल संपत्ति का ब्योरा जमा करना होता है, जबकि समूह ‘घ’ (क्लास फोर) कर्मियों के लिए यह समयावधि पांच साल तय की गई है।
इसके अलावा, नियमावली में स्पष्ट निर्देश है कि कोई भी सरकारी सेवक अपनी तैनाती वाले जिले में अपनी पत्नी या किसी आश्रित रिश्तेदार को बीमा एजेंट के तौर पर काम करने की अनुमति नहीं देगा, जिससे पद के दुरुपयोग की संभावना समाप्त की जा सके।





