उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सड़क दुर्घटनाओं से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि केवल शराब की गंध के आधार पर वाहन चालक को नशे में मानना कानूनी रूप से सही नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक ब्लड टेस्ट या ब्रेथ एनालाइज़र टेस्ट से यह साबित न हो कि चालक के शरीर में अल्कोहल की मात्रा तय सीमा से अधिक है, तब तक नशे की स्थिति का आरोप प्रमाणित नहीं माना जाएगा।
मामला 2016 की रुद्रपुर दुर्घटना से जुड़ा
यह फैसला उस मामले में आया जिसमें 2016 में रुद्रपुर के सिडकुल चौक पर एक सड़क दुर्घटना में जय किशोर मिश्रा (39 वर्ष) की मौत हो गई थी। मृतक पंतनगर की नीम मेटल प्रोडक्ट्स लिमिटेड में कार्यरत थे और उनके परिवार ने ₹75 लाख मुआवजे की मांग की थी।
निचली अदालत ने डॉक्टर की रिपोर्ट के आधार पर जिसमें कहा गया था कि चालक से शराब की गंध आ रही थी, बीमा कंपनी को ₹21 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया था। साथ ही, राशि की वसूली चालक और मालिक से करने की अनुमति दी थी।
हाईकोर्ट ने बदला फैसला
न्यायमूर्ति आलोक महरा की एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि:
✔ चालक का न तो ब्लड टेस्ट हुआ और न ही यूरिन टेस्ट।
✔ केवल गंध या संदेह नशे का प्रमाण नहीं है।
✔ वैज्ञानिक प्रमाण के बिना चालक को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
इसके बाद अदालत ने निचली अदालत के आदेश को संशोधित करते हुए कहा कि बीमा कंपनी ही मुआवजे की पूरी राशि देगी और उसे चालक या वाहन मालिक से रकम वसूलने का अधिकार नहीं होगा। साथ ही, अपीलकर्ता द्वारा जमा कराई गई बैंक गारंटी को भी रिलीज करने का आदेश दिया गया।
फैसला क्यों अहम है?
हाईकोर्ट का यह निर्णय सड़क दुर्घटना मामलों में ‘शराब पीकर गाड़ी चलाने’ के आरोपों पर कानूनी स्पष्टता प्रदान करता है। अक्सर पुलिस या डॉक्टर केवल शराब की गंध देखकर रिपोर्ट बना देते हैं, जिससे चालक को दोषी ठहराने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। अदालत ने कहा है कि वैज्ञानिक परीक्षण के बिना ऐसे आरोप साबित नहीं किए जा सकते।
इस फैसले से:
✔ निर्दोष चालकों को बेवजह दोषी ठहराने से बचाया जाएगा।
✔ जांच में वैज्ञानिक साक्ष्य की भूमिका और मजबूत होगी।
✔ सड़क दुर्घटना मुआवजा मामलों में न्याय की प्रक्रिया और पारदर्शिता सुनिश्चित होगी।


